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वन पर्व
अध्याय १५२
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राक्षसा ऊचुः
आक्रीडोऽय़ं कुवेरस्य दय़ितः पुरुषर्षभ |  ४   क
नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मिणा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति