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द्रोण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणानीकमसम्वाधं मम प्रिय़चिकीर्षय़ा |  ४   क
भित्त्वा व्यूहं प्रविष्टोऽसौ गोमध्यमिव केसरी ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति