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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाद्य एवं गाण्डीवं देह्यन्यस्मै त्वमित्युत |  १०८   क
स वध्योऽस्य पुमाँल्लोके त्वय़ा चोक्तोऽय़मीदृशम् ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति