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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
इति कृष्णवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ११३   क
ससम्भ्रमं हृषीकेशमुत्थाप्य प्रणतं तदा |  ११३   ख
कृताञ्जलिमिदं वाक्यमुवाचानन्तरं वचः ||  ११३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति