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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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कृष्ण उवाच
न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथञ्चन |  १८   क
श्रुतेन ज्ञाय़ते सर्वं तच्च त्वं नाववुध्यसे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति