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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
तस्य कोपं समुद्वीक्ष्य चित्तज्ञः केशवस्तदा |  २   क
उवाच किमिदं पार्थ गृहीतः खड्ग इत्युत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति