कर्ण पर्व  अध्याय ४९

कृष्ण उवाच

स कदाचिन्मृगाँल्लिप्सुर्नान्वविन्दत्प्रय़त्नवान् |  ३६   क
अथापश्यत्स पीतोदं श्वापदं घ्राणचक्षुषम् ||  ३६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति