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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
राजा श्रान्तो जगतो विक्षतश्च; कर्णेन सङ्ख्ये निशितैर्वाणसङ्घैः |  ६४   क
तस्मात्पार्थ त्वां परुषाण्यवोच; त्कर्णे द्यूतं ह्यद्य रणे निवद्धम् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति