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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
त्वमित्यत्रभवन्तं त्वं व्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् |  ६७   क
त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति