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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
भ्राता प्राज्ञस्तव कोपं न जातु; कुर्याद्राजा कञ्चन पाण्डवेय़ः |  ७१   क
मुक्तोऽनृताद्भ्रातृवधाच्च पार्थ; हृष्टः कर्णं त्वं जहि सूतपुत्रम् ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति