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वन पर्व
अध्याय ७४
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वृहदश्व उवाच
त्वय़ा तु धर्मभृच्छ्रेष्ठे शापेनाभिहतः पुरा |  १७   क
वनस्थय़ा दुःखितय़ा शोचन्त्या मां विवाससम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति