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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
महावलो वैश्रवणान्तकोपमः; प्रसह्य हन्ता द्विषतां यथार्हम् |  ७७   क
स भीमसेनोऽर्हति गर्हणां मे; न त्वं नित्यं रक्ष्यसे यः सुहृद्भिः ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति