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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
सुय़ुक्तमास्थाय़ रथं हि काले; धनुर्विकर्षञ्शरपूर्णमुष्टिः |  ८०   क
सृजत्यसौ शरवर्षाणि वीरो; महाहवे मेघ इवाम्वुधाराः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति