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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
यतामि नित्यं तव कर्तुमिष्टं; दारैः सुतैर्जीवितेनात्मना च |  ८२   क
एवं च मां वाग्विशिखैर्निहंसि; त्वत्तः सुखं न वय़ं विद्म किञ्चित् ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति