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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
अक्षेषु दोषा वहवो विधर्माः; श्रुतास्त्वय़ा सहदेवोऽव्रवीद्यान् |  ८६   क
तान्नैषि सन्तर्तुमसाधुजुष्टा; न्येन स्म सर्वे निरय़ं प्रपन्नाः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति