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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
इत्येव पृष्टः पुरुषोत्तमेन; सुदुःखितः केशवमाह वाक्यम् |  ९०   क
अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव; प्रसह्य येनाहितमाचरं वै ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति