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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
निशम्य तत्पार्थवचोऽव्रवीदिदं; धनञ्जय़ं धर्मभृतां वरिष्ठः |  ९१   क
प्रव्रूहि पार्थ स्वगुणानिहात्मन; स्तथा स्वहार्दं भवतीह सद्यः ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति