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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
पाणौ पृषत्का लिखिता ममेमे; धनुश्च सङ्ख्ये विततं सवाणम् |  ९५   क
पादौ च मे सशरौ सहध्वजौ; न मादृशं युद्धगतं जय़न्ति ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति