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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्याः; प्राच्या निरस्ता दाक्षिणात्या विशस्ताः |  ९६   क
संशप्तकानां किञ्चिदेवावशिष्टं; सर्वस्य सैन्यस्य हतं मय़ार्धम् ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति