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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
प्रसाद्य राजानममित्रसाहं; स्थितोऽव्रवीच्चैनमभिप्रपन्नः |  ९९   क
याम्येष भीमं समरात्प्रमोक्तुं; सर्वात्मना सूतपुत्रं च हन्तुम् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति