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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः |  १   क
गार्हस्थ्यं धर्ममास्थाय़ असितो देवलः पुरा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति