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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा भिक्षुरूपेण प्राप्तं तत्र महामुनिम् |  १०   क
गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति