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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां पतिम् |  १५   क
जैगीषव्यं ततोऽपश्यद्गतं प्रागेव भारत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति