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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं चिन्तय़ामास महर्षिरसितस्तदा |  १७   क
स्नात्वा समुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप ह ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति