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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
कृतजप्याह्निकः श्रीमानाश्रमं च जगाम ह |  १८   क
कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय़ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति