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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
न व्याहरति चैवैनं जैगीषव्यः कथञ्चन |  २०   क
काष्ठभूतोऽऽश्रमपदे वसति स्म महातपाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति