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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि; र्जित्वा सपत्नान्प्रतिलभ्य राज्यम् |  १९   क
शैलेन्द्र भूय़स्तपसे धृतात्मा; द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति