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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः |  २३   क
मय़ा दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथं त्वय़म् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति