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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं विगणय़न्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः |  २४   क
उत्पपाताश्रमात्तस्मादन्तरिक्षं विशां पते |  २४   ख
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति