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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दाप्रिय़ाप्रिय़ः |  ३   क
काञ्चने लोष्टके चैव समदर्शी महातपाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति