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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं; पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे |  ८   क
अभ्याय़युस्ते वदरीं विशालां; सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति