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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
यजन्ते पुण्डरीकेण राजसूय़ेन चैव ये |  ३४   क
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति