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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशाहैश्च सत्रैर्ये यजन्ते विविधैर्नृप |  ३७   क
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति