वन पर्व  अध्याय ६७

वृहदश्व उवाच

स कुरुष्व महेष्वास दय़ां मय़ि नरर्षभ |  १५   क
आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतम् ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति