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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
शुश्रूषुरपि दुर्मेधाः पुरुषोऽनिय़तेन्द्रिय़ः |  १   क
नालं वेदय़ितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मतिः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति