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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विमुक्तकवचा विभो |  ११   क
विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतसः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति