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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
सर्वास्त्रविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुतः |  १३   क
न च ते जातु लोकेऽस्मिन्सुसूक्ष्ममपि किल्विषम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति