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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
त्वं पुनः सूर्यसङ्काशः श्वोभूत उदिते रवौ |  १४   क
प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति