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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो निय़तेन्द्रिय़ः |  ३   क
जानीय़ादागमान्सर्वान्ग्राह्यं च न विरोधय़ेत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति