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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
तं तथैव हनिष्यामि न्यस्तवर्माणमद्य वै |  ३३   क
पुत्रं पाञ्चालराजस्य पापं पापेन कर्मणा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति