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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
यय़ुश्च शिविरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो |  ३८   क
द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ रथोत्तमे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति