सौप्तिक पर्व  अध्याय ५

कृप उवाच

स कल्याणे मतिं कृत्वा निय़म्यात्मानमात्मना |  ८   क
कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्यसे ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति