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स्त्री पर्व
अध्याय ५
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विदुर उवाच
तेषां मधूनां वहुधा धारा प्रस्रवते सदा |  १७   क
तां लम्वमानः स पुमान्धारां पिवति सर्वदा |  १७   ख
न चास्य तृष्णा विरता पिवमानस्य सङ्कटे ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति