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स्त्री पर्व
अध्याय ५
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विदुर उवाच
अभीप्सति च तां नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः |  १८   क
न चास्य जीविते राजन्निर्वेदः समजाय़त ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति