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शान्ति पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
विमुक्तः कुण्डलाभ्यां च सहजेन च वर्मणा |  १०   क
निहतो विजय़ेनाजौ वासुदेवस्य पश्यतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति