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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप |  २१   क
तत्रारोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रिय़ः |  २१   ख
महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति