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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ द्वारपालं तरन्तुकम् |  १३   क
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति