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अनुशासन पर्व
अध्याय ५
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भीष्म उवाच
वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः |  २७   क
आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति