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अनुशासन पर्व
अध्याय ५
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भीष्म उवाच
एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः |  ३१   क
सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति