आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ५

व्यास उवाच

स्पर्धते सततं स स्म देवराजेन पार्थिवः |  १३   क
वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति